Vali Kaveri by Ashok Drolia , Rajani Drolia
संगम साहित्य के रूप में संगृहीत गीत और ‘मणिमेहलै’ तथा ‘शिलप्पडिहारम्’ रचनाएँ भारतीय समाज और संस्कृति की मूल प्रवृत्तियों के बहुत निकट हैं। इनमें जीवन का जो चित्र उमड़ता है, उसे हृदयंगम किए बिना दक्षिण भारत ही नहीं, संपूर्ण भारत के इतिहास और सांस्कृतिक विकास को ठीक-ठीक समझ पाना कठिन है। दूसरी बात यह है कि इन काव्यों में तत्कालीन जीवन का जो चित्रण हुआ है, वह अपने आप में इतना पूर्ण है कि उसमें बहुत परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है। हिंदी में यह सामग्री अब भी विरल रूप से ही उपलब्ध है। अंग्रेजी में इसके कुछ अच्छे अनुवाद हुए हैं, परंतु वे हिंदी पाठकों के लिए दुरूह हैं और दुर्लभ भी। अत: इस कथा के रूप में इनका परिचय कराकर हिंदी पाठकों को इस अमूल्य निधि की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया है।
प्रस्तुत है यह कथा, उन्हीं की, लोक-प्रभव, शुभ, सकल सिद्धिकर। विघ्नेश्वर तो सरल हृदय हैं, योगक्षेम के उन्नायक हैं, बस थोड़ा सम्मान चाहिए, प्रेमपूर्ण व्यवहार चाहिए, मार्ग हमारा सुकर करें वे, उनसे यह वरदान चाहिए।
| Publication Language |
Hindi |
|---|---|
| Publication Access Type |
Freemium |
| Publication Author |
ASHOK DROLIA ,RAJANI DROLIA |
| Publisher |
Prabhat Prakashana |
| Publication Year |
2014 |
| Publication Type |
eBooks |
| ISBN/ISSN |
9788177212341' |
| Publication Category |
Premium Books |
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